Wednesday, July 30, 2008

राजिव्किशोर की माता जी का निधन

फिर एक दुखद समाचार है। अपने साथी राजिव्किशोर की माता जी श्रीमति निर्मला प्रसाद का मंगलवार देर रत निधन हो गया। वह करीब ६० साल की थीं। कुछ दिन पहले ही उन्हें हार्ट की प्रॉब्लम आई थी। बेहतर इलाज के लिए ही उन्हें दिल्ली लाया गया था। लेकिन अचानक चलते-फिरते उन्होंने सभी का साथ छोड़ दिया। राजीव के द्वारका स्थित फ्लैट में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली। वह अपने पीछे अपने पति, दो लड़के, लड़की, बहु, पोता-पोती और नाती-नातिन से भरा पुरा परिवार छोड़ गईं। बुधवार शाम ही एयर रूट से उन्हें पटना ले जाया गया। अन्तिम संस्कार पटना में ही होना तय हुआ है। हम ब्लॉग के सभी साथियों की ओर से उन्हें स्राधांजलि देते हैं. साथ ही दुःख की इस घड़ी में शोकाकुल परिवार के लिए दुआ करते हैं।

Friday, July 25, 2008

भाई, वो डॉक्टर साहब कहाँ चले गए

अरे भाई, वो डॉक्टर साहेब कहाँ हैं आजकल। कौन डॉक्टर ? अरे वही नॉएडा वाले। तुम यार डॉक्टर को भी नहीं जानते हो। लगता है तुम्हे देश के नेशनल मैटर वाले ख़बरों से भी कोई मतलब नहीं होता है। नेशनल मैटर। हाँ यार दिन रात चैनल पर वही समाचार आता था। कोई चैनल खोलो। सिर्फ़ एक ही चीज दिखती थी। कातिल कौन ? कातिल कौन ? टीवी पर ई मामला इतना चला की घर-घर में जाँच होने लगी। सास-बहु भी अपना झगडा भुला इसी खुलासे में लग गई थी। सैलून में बाल काटने वाला भाई भी बीच में कैंची रोककर इसी खुलासे में लग जाता था । अच्छा सर बताइए..... । चैनल वालों ने तो उसके घर के पास कई शिफ्टों में ड्यूटी लगा दी थी। एक-दो नहीं। दस-दस ओबी वैन लगे रहते थे। बेचारे मुहल्ले वालों का जीना मुश्किल हो गया था। कभी नाला खंगालते अधिकारी टीवी पर नज़र आते थे। तो कभी किसी गार्ड से पूछ ताछ होती थी। खुलासा। अरे खुलासे की तो बात मत करो। चैनलों पर रोज रात में इस हत्याकांड के खुलासे का दावा किया जाता था। जब सभी लोग टीवी खोलते तो एंकर बोलतो थी..आप बने रहिये। थोडी ही देर में हम देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्त्री का खुलासा करने वाले हैं। लोग भी टीवी से चिपक कर बैठ जाते थे। टेलर देख कर लगता था की आज कुछ नहीं बचेगा। आज कातिल बेनकाब होकर रहेगा. सभी लोग फ़ैल हो जाएँगे। तभी ब्रेक हो जाता था। फ़िर लगता था की ब्रेक के बाद खुलासा हो जाएगा लेकिन॥ ऐसा नहीं हुआ। डॉक्टर साहब जब जमानत पर छुट कर घर आने लगे तो कई चैनल वाले रास्ते भर कवर करते आये। ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच की तरह कुछ ने तो लाइव ही कर दिया था। डॉक्टर साहब घर न जाकर ससुराल आ गए। लेकिन यहाँ भी छुटकारा कहाँ मिलती। उनके पहुँचने से पहले ओबी वैन पहुँच गई थी। फ़िर कई दिनों तक यही चलता रहा की अभी वह अपने ससुराल में ही हैं। उनके प्रति संवेदना के साथ ही जाँच एजेन्सी पर सवाल भी उठाये जाते रहे। दो-चार दिन यही मामला चला। लेकिन इधर परमाणु करार। फ़िर करार पर सरकार। यही सब टीवी पर आने लगा। अब तो डॉक्टर साहब के घर क्या ससुराल पर भी ओवी वैन नहीं है। अब कुछ ओबी वैन पार्लियामेंट तो कुछ बीजेपी और कांग्रेस के दफ्तर पहुँच गई। कुछ लाल झंडे वालों के पास भी लगी है। ऐसे में भला अब किसे फुर्सत है डॉक्टर साहेब की। मामले का चाहे जो भी हस्र हो। अब मीडिया वालों को क्या। दूसरा मसाला जो मिल गया है।

Thursday, July 17, 2008

सुप्रतिम को देखिये, कभी हिम्मत मत हारिये..

सचमुच इसे सुप्रतिम की मौत पर जीत ही कहेंगे। दिल्ली की इस घटना को जिसने भी देखा वो दहल गया, लेकिन उस हिम्मतवाले को दाद दीजिये जिसने उस रड को इतने देर तक बर्दास्त किया। एक रड पहले कार में घुसता है फिर वह उसके पेट के उपरी हिस्से को भेदते हुए पीठ को पार कर जाता है। निश्चित तौर पर यह देखने वालों को भी हिलाने वाला था, लेकिन उसने अपने को पुरी तरह संभाले रखा। जहाँ एक छोटी गोली और एक छोटा चाकू भी आदमी की जान ले लेता है, वहां सुप्रतिम का अब भी सलामत रहना तो यही कहता है.....शाबाश आपके हिम्मत की और शुक्रिया उपरवाले का। साथ ही शुक्रिया उन डॉक्टरों का जिन्होंने भगवान् जैसा काम किया। इसीलिए कहा जाता है की आदमी को मरते दम तक हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। हो सकता है आपको सफलता तब मिले जब आप आखिरी छोर तक पहुँच जायें.....सुप्रतिम से यही सिख लीजिये। कभी हिम्मत मत हारिये..

धन्यवाद.

Friday, July 11, 2008

अरे ये क्या हुआ....

नरेन्द्रनाथ के यह कहते ही की ..कोमल जी नहीं रहे. एक हाथ में तौलिया लिए मैं ठिठक गया। नरेन्द्र उस दर्दनाक घटना के बारे में बता रहे थे और मैं आगे की वो पुरी बदहवास तस्वीर बना रहा था। पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ। ऐसा भला कैसे हो सकता है। लेकिन उन्होंने कहा की अभी प्रदीप से बात हुई है। तुम भी कर लो। तब तक राकेश प्रियदर्शी फ़िर गणेश का फोन आ गया। सभी के जुबान से सिर्फ़ इतना ही निकल रहा था की अरे ये क्या हुआ। मैं सुबह कहीं निकलने वाला था। लेकिन आगे कदम बढ़ाने की हिम्मत नहीं हुई सो कुर्सी पर ही बैठा रहा गया। आनन् फानन में पहले कंचन जी को गोरखपुर फोन लगाया। यह सुनते की उनकी बॉडी वहां है। पोस्टमार्टम हो रहा है। मुझे सांप सूंघ गया। रात में ही राकेश से कोमल की चर्चा हो रही थी। लेकिन यह किसे पता था की हर काम धीरे-धीरे समझ बुझ के साथ करने वाले कोमल जी जिंदिगी की रफ्तार में इतने आगे निकल जायेंगे। लेकिन हुआ कुछ ऐसा ही। वो बनार्शी अदा वाले कोमल भइया हमारे बीच नहीं रहे। पटना से मुजफ्फरपुर तक की वो आठ साल की लम्बी याद कोई नहीं भुला पायेगा। मैं जब टेंसन में आता था तो वह कहते थे...अरे छोड़ो ये सब तो लगा रहता है. हर सुख-दुःख वो बतियाते थे. यह उनका व्यव्हार ही कहें की पत्रकारिता से जुड़े लोग तो छोडिये उनका मुजफ्फरपुर के उन आम लोगों , जिस बीट पर वह कम करते थे, से भी उतना ही लगाव था। वह हमेशा अपने परिवार की चिंता करते रहते थे। अपने छोटे भाई की नौकरी के लिए वह हमेशा चिंतित रहते थे। वह बताते थे की छोटी उम्र से ही उन्होंने संघर्ष किया है। पिछले हफ्ते ही उनसे फोन पर बात हो रही थी। उन्होंने कहा था..तोहर ब्लॉग के प्रयाश ठीक हा, अभी एक्राके पुरा नहीं पढ़ले वाणी। फुर्सत मिली तब परहम और कमेन्ट भी करम.....लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इस दुखद समाचार को सुनते ही राकेश प्रियदर्शी और गणेश मेहता ने फोन किया. दोनों फ़ौरन गोरखपुर के लिए निकल गए. पटना से विवेक श्रीवास्तव भइया से बात हो रही थी। उन्होंने तुंरत कोमल जी के परिवार के लिए कुछ कदम उठाने की सलाह दी जिसे सभी लोगों ने मान लिया। अब तो हमारे बीच कोमल जी नहीं रहे, लेकिन भरा पुरा उनका परिवार आज भी है जिसकी चिंता हमेशा वो किया करते थे। ऐसे में हम सभी साथियों की तरफ़ से उनके परिवार के लिए उठाया गया कदम ही उन्हें सच्ची स्राधान्जली होगी।

बेहद दर्दनाक, कोमल जी अब हमारे बिच नहीं रहे

बेहद दर्दनाक और बुरी ख़बर।
अपने साथी कोमल जी अब हमारे बिच नहीं रहे। आजमगढ़ के करीब एक रोड एक्सीडेंट में उनकी जीवन इहलीला समाप्त हो गई। गुरुवार की देर रात वह अपने कुछ साथियों के साथ वाराणसी से लौट रहे थे की रास्ते में एक ट्रक से उनकी गाड़ी की टक्कर हो गई। इस दुर्घटना में उनके साथ ही दो अन्य की स्पॉट डेथ हो गई। इसमे अमरउजाला गोरखपुर के फोटोग्राफर वेदप्रकाश भी शामिल हैं। चार अन्य लोग अभी अस्पताल में भरती हैं। कोमल जी फिलहाल अमरउजाला गोरखपुर में कार्यरत थे। इसके पहले वह हिंदुस्तान मुजफ्फरपुर और हिंदुस्तान पटना में रह चुके है। वह करीब तैंतीस साल के थे. उनके परिवार में उनकी पत्नी, दो छोटे बच्चे और एक छोटा भाई है। वाराणसी के कई अख़बारों में भी वह काम कर चुके थे। कोमल जी के साथ ही इस दुर्घटना में मारे गए सभी लोगों की आत्मा की शान्ति के लिए श्रधान्जली देते हैं। साथ ही कामना करते हैं की उनके परिवार पर जो दुखों का पहाड़ टुटा है उसे बर्दास्त करने की हिम्मत आए। हम सभी साथी जैसे कोमल जी के साथ थे आज इस दुःख की घड़ी में उनके परिवार के साथ हैं। हादसे की जानकारी होते ही अपने कुछ साथी मुजफ्फरपुर से गोरखपुर के लिए रवाना हो गए हैं।

Tuesday, July 8, 2008

नई पारी के लिए बधाई.

प्रेम भइया पहले तो आपको जीवन की नई पारी शुरू करने के लिए बधाई। भाई व्यस्तता के कारणनहीं आ पाया। दिल्ली में रहने वाले कुछ और साथी नहीं जा पाए। लेकिन सभी ने आपको बधाई दी है। कृपया कर इसे स्वीकार करें। आप और मेरी नई भाभी दोनों को एक बार फ़िर अपने सभी भूले भटके साथियों के तरफ़ से बधाई। आपका जीवन मंगलमय हो यही कामना है.

धन्यवाद.

Saturday, July 5, 2008

बाथरूम नहीं...अब मीटिंग जनाब

एक जमाना था जब साहब टाइप लोग बाथरूम में ही होते थे। फोन करने पर साहब सामने नहीं आते थे, लेकिन जवाब आता था, साहब बाथरूम में हैं। एक बार एक जिले के डीएम के आवास पर मैंने फोन किया। किसी खबर पर प्रतिक्रिया लेनी थी। फोन ड्यूटी पर तैनात स्टाफ ने कहा की साहब अभी बाथरूम में हैं। एक घंटे के बाद किया तो भी वही जवाब साहब अभी..... फ़िर एक घंटे बाद भी वैसा ही। कुल मिलकर साहब से बात करने का कोई मौका नहीं। लेकिन अब जमाना बदल रहा है तो फोन वाला पैटर्न भी बदलना होगा। अब तो मोबाइल आ गया है। इसके लिए इसके हिसाब का बहाना चाहिए। सो, भाई लोग इसका भी हल निकालने में देर नहीं किए। खासकर दिल्ली में रहने वाले साहब टाइप के लोग अब बाथरूम से सीधे मीटिंग में आ गए हैं। ये साहब टाइप लोग मीटिंग में कम ही बैठते हैं लेकिन मीटिंग जरुर इनकी जुबान पर हमेशा बैठी होती है। रिंग आते ही झट से काट देंगे। या हेल्लो कहते ही कहेंगे अभी मीटिंग में हूँ बाद में करना। इसी तरह के एक साहब इन दिनों एक चैनल में हैं। चैनल में उनकी औकात बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन अपने उपर वाले से सिखा होगा। वह भी मीटिंग में ही लगे रहते हैं। कुछ लोग तो उनके दफ्तर में ही पहुँच कर उन्हें रिंग करते हैं..जवाब आता है अभी मीटिंग में हूँ। जबकि वह कैम्पस में ही सिगरेट फूंक रहे होते है। लोग कहते हैं की एक दिन उनके पिता फोन कर रहे थे। बेचारे की आदत ख़राब हो गई है सो उन्हें भी मीटिंग कहकर फोन काट दिया। उस समय वह एक अपनी आधी उम्र की बाला से ठिठोली कर रहे थे। अब उन्हें कौन समझाये की कम से कम बाप से तो बात कर लिया करो.
धन्यवाद.

Friday, July 4, 2008

कुछ लिया है तो देना भी सीखो...

गुड मोर्निंग, मैं प्रभुराम आपका पड़ोसी। और ये मेरी बीबी नाथूराम . आज ही यहाँ आया हूँ। एक अमेरिकी कंपनी में हूँ। इसी सेक्टर में मेरा कारपोरेट ऑफिस है। हम दोनों वहीँ जॉब करते हैं। इसीलिए सोचा यहीं फ्लैट किराये पर ले लूँ। बहुत स्वागत है आपका। मैं ज्वाला प्रसाद हूँ। लेकिन आपने क्या कहा मेरी बीबी....। जी हम दोनों ने शादी कर ली है। एक दूजे को जान से ज्यादा चाहते हैं। कहकर दोनों ऑफिस निकल गए। लेकिन फौज से सेवानिवृत ज्वाला जी को भला ये बात कैसे हजम होती। भला दो लड़के आपस में कैसे शादी कर सकते हैं। ज्वाला जी ने भी अपने दरवाजे की कुण्डी लगाई और डायनिंग हॉल में निढाल बैठ सोचने लगे। पुराने ख़यालात की उनकी पत्नी भी तब तक पूजापाठ निपटा चुकी थी। आते ही कहा कौन था। किसने घंटी बजाई थी। ज्वाला बाबु ने उनकी ओर देखा और बोले-नए पड़ोसी हैं। प्रभुराम और नाथूराम। यहीं एक कंपनी में काम करते हैं। नाम सुनते ही उनकी पत्नी शारदा ने कहा क्या सोसाइटी वालों ने बैचलर को मकान दे दिया। ये कैसे किया। मेरे घर में जवान लड़कियां है। भला बगल वाले फ्लैट में बैचलर कैसे रह सकता है। यह सब चुपचाप सुन रहे ज्वाला जी कहते हैं अरे बैचलर तो है लेकिन .... अरे लेकिन क्या। अच्छा बाद में बताऊंगा। अरे अभी बताइए। परेशान ज्वाला जी गरम हो गए। कहा अरे भाई फ़िर से एक बार मुझे कन्फर्म हो लेने दो। इसके बाद ही कुछ बताऊंगा। उनकी पत्नी और झुंझला गई। पहले बात तो बताइए कन्फर्म बाद में कीजियेगा। ऐसी कौन सी बात है की आप इतना परेशान हो गए। कोई चारा नहीं देख ज्वाला जी बोले अरे क्या कहें। बैचलर तो है लेकिन कह रहे थे की दोनों मियां-बीबी हैं। क्या दो लड़के भला मियां-बीबी कैसे हो सकते हैं। आपका दिमाग तो ठीक हैं न। अरे यही सुनकर तो मेरा दिमाग घूम गया है। भला दो लड़के मियां-बीबी कैसे हो सकते हैं। हे भगवान् । इतने में उनकी बड़ी बिटिया रीमा आ गई। क्यों भगवान्-भगवान् हो रही है। ऐसा क्या हो गया। अरे पापा सुना नए पड़ोसी आए हैं। क्या करते हैं। अंकल, आंटी ही हैं की बच्चे भी। अरे तुम्हे क्या लेना देना कोई भी हो। अरे भाई मुझे लगा की बड़े बच्चे होंगे तो मेरे फ्रेंड बनेंगे। छोटे बच्चे होंगे तो और मजे से टाइम पास होगा। इतने में उसकी मम्मी बोली। अरे कोई नहीं है दो लड़के कहाँ से आ गए हैं। ये सोसाइटी वालों ने ठीक नहीं किया। लेकिन तुम्हें इससे क्या है। कोई हो। अगले दिन यह समस्या लेकर ज्वाला जी अपने एक सेवानिवृत बॉस के यहाँ पहुंचे।देखते ही बॉस ने बैठने को तो कहा लेकिन कुछ सोच में तल्लीन दिखे। चेहरे पर चिंता साफ दिख रही थी। खैर उन्होंने रुमाल से पसीना साफ करते हुए कहा और ज्वाला बताओ कैसे आना हुआ। ज्वाला जी ने पहले उनकी चिंता के बारे में पूछा। उन्होंने कहा अरे क्या कहूँ एक पड़ोसी से परेशान हूँ,। मेरे बगल वाले फ्लैट में दो लड़कियां आई हैं। सुबह दोनों ने मुझे नमस्ते अंकल कहा। तबतक तो ठीक था लेकिन इसके बाद जो कहा वो आज तक मेरे दिमाग में नाच रहा है। जानते हो ज्वाला वो दोनों कोई पच्चीस साल की होंगी। टेंशन यह है की मैंने पूछा की तुम दोनों अकेली रहोगी की घर से कोई और आएँगे। इतने में उन दोनों ने कहा अब कौन आयेंगे अंकल। हम दोनों मियां-बीबी हैं। हमने शादी कर ली है। तुम ही बताओ ज्वाला भला ऐसा कभी हो सकता है की दो लड़कियां एक-दुसरे की पति पत्नी हो।बॉस मैं क्या कहूँ मैं भी तो वही आपसे पूछने आया था की क्या दो लड़के आपस में पति-पत्नी हो सकते हैं। क्या मतलब। बॉस जैसे आपके पड़ोस में दो लड़कियां आपके लिए टेंशन बनी हैं उसी तरह मेरे पड़ोस में दो लड़के टेंशन बन गए हैं। फिर क्या दोनों बुढ्ढे अपनी पुरानी संस्कृति के पन्ने खोलने लगे। पति-पत्नी, वो अग्नि साक्षी और शादी। अब तो नया जमाना है। शादी के लिए भला लड़के की क्या जरुरत। लड़का-लड़का से और लड़की-लड़की से ही शादी कर रहे हैं। लेकिन ज्वाला क्या यही समाज है। इसी के लिए हमने संघर्ष किया। भला इन बच्चों का वंश कैसे चलेगा। क्या इनके माता-पिता सहमत होंगे। उनके दिल पर क्या बीतेगी। एक हमारा समाज है की लड़की से दोस्ती पर भी नज़र नहीं उठती थी घरवालों के सामने। और ये भला इतनी बड़ी बात... इन्हे कौन समझायेगा की यही जिंदगी नहीं है। खाने-पिने-भोगने से आगे भी कुछ है..समाज को भी कुछ देना होगा जिसने तुम्हे बहुत कुछ दिया है। उस पिता के अरमान और माता की चाहत का क्या होगा जो तुम्हे चम्मच में दूध पिलाने से लेकर चंदा मामा दिखाने तक कुछ सपने देखती थीं। कुछ लिया है तो देना भी सीखो...

धन्यवाद.

Wednesday, July 2, 2008

जल्द चंगा हों आप

सभी साथियों को मेरा नमस्कार,

सबसे पहले मैं अपनी टीम की तरफ़ से विनय भाई को थोडी आजादी के लिए बधाई देना चाहूँगा। दिल्ली आकर उन्होंने सहारा ज्वाइन किया पिछले महीने रिक्क्शेवाले की गलती से उनका लेफ्ट हाथ टूट गया। आप सोच रहे होंगे की उनका हाथ टूट गया और ये बधाई कैसी। बधाई इसलिए की हाथ पर लगे बंधन नुमा प्लास्टर को सफलतापूर्वक उन्होंने झेल लिया। अब प्लास्टर उतर गया है। सो हाथ को थोडी रहत मिली है। इसीलिए बधाई। पुरी बधाई इसलिए नहीं की अभी उनको थोड़ा और धैर्य दिखाना है। वह काफी संयमित व्यक्तित्वा वाले पहले से हैं। खैर हमलोग यही उम्मीद करेंगे की आगे कुछ दिन और धैर्य रखें ताकि हाथ फिर से हर कम के लिए चंगा हो जाए। ब्लॉग के साथी आपके जल्द दुरुस्त होने की कामना करते हैं।

धन्यवाद.